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समय से पहले पैदा हुए बच्चे

समय से पहले पैदा हुए बच्चे

वैश्विक स्तर पर पैदा होने वाले 15 मिलियन बच्चों में से 1/5 भारत में जन्म लेते हैं। यह देखते हुए

कि दुनिया भर में 5 साल से कम उम्र के बच्चों में मृत्यु का प्रमुख कारण समय से पहले पैदा होना है, इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत को नवजात शिशु की गहन चिकित्सा देखभाल सुविधाओं की बहुत बड़ी आवश्यकता है। लेकिन डॉ अमीष वोरा, वरिष्ठ सलाहकार एनआईसीयू, पीआईसीयू और ईसीएलएस, नारायणा हेल्थ – एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल, विवेक रॉय चौधरी बताते हैं कि नवजात स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता उतनी अधिक नहीं है जितनी कि कैंसर या हृदय संबंधी बीमारियों के लिए है।

चिकित्सा के संदर्भ में अपूर्णकालता क्या है?

एक पूर्ण गर्भावस्था की अवधि 40  हफ्ते (280 दिन) होती है। इस अवधि के दौरान महिलाओं के गर्भ में कई चीजें घटित होती है और इसकी समाप्ति जन्म लेने वाले ऐसे बच्चे के रूप में होती है जो स्वतंत्र जीवन के लिए तैयार होता है। जब गर्भावस्था के 37 हफ्ते पूरे होने से पहले एक बच्चे का जन्म होता है तो उसे अपूर्णकालिक शिशु माना जाता है। यह दुनिया भर में अपनाई जाने वाली मानक परिभाषा है। दूसरे शब्दों में यदि एक बच्चा मां के गर्भ के अंदर उसकी पूर्ण परिपक्वता से पहले पैदा होता है तो उसे  अपूर्णकालिक शिशु माना जाता है।

नवजात गहन देखभाल इकाई (एनआईसीयू) के स्थापना की लागत क्या है? निवेश, समय, आदि के संदर्भ में.

2003 के आंकड़ों के अनुसार लागत 3.7 करोड़ रुपये थी, हमारे पास कोई नया प्रकाशित डेटा नहीं है। मुझे लगता है कि यह अब की तुलना में बहुत अधिक होगा।

क्या सभी एनआईसीयू समान होते हैं?

2012 में अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स ने नवजात शिशु की देखभाल को चार अलग-अलग स्तरों में विभाजित किया है। स्तर I सुविधाएं (अच्छी तरह से जन्म लिए नवजात शिशु के लिए नर्सरी) उन नवजात शिशुओं को, जिनको की कम जोखिम रहता है, को बुनियादी स्तर की देखभाल प्रदान करती हैं। उनके पास हर प्रसव में नवजात को पुनर्जीवित करने और स्वस्थ नवजात शिशुओं को प्रसव पश्चात मूल्यांकन कर देखभाल करने की क्षमता होती है।

स्तर II (विशेषता-स्तर की सुविधा) स्थिर या मध्यम रूप से बीमार नवजात शिशुओं की देखभाल के लिए है जो 32वें हफ्ते या उससे पहले पैदा हो जाते हैं या जिनका जन्म के समय 1500 ग्राम से कम रहता है साथ ही उन समस्याओं के साथ आते हैं जिनके तेजी से समाधान होने की उम्मीद है।

स्तर III एनआईसीयू में कर्मियों के निरंतर उपलब्ध रहने (नवजात शिशु रोग विशेषज्ञ, नवजात शिशु के लिए नर्स, श्वसन थेरेपिस्ट) और उपकरणों द्वारा जब तक आवश्यक हो जीवनरक्षक सहायता प्रदान करने के द्वारा परिभाषित किया गया है। इन इकाइयों में उन्नत श्वसन सहायता, शारीरिक निगरानी उपकरण, प्रयोगशाला और इमेजिंग सुविधाएं, पोषण और फार्मेसी सहायता के साथ बाल चिकित्सा विशेषज्ञता और सामाजिक सेवाओं के लिए सुविधाएं होती है।

स्तर IV इकाइयों में स्तर III की क्षमताएं शामिल होती है, इसके साथ साथ सबसे अधिक जटिल और गंभीर रूप से बीमार नवजात शिशुओं की देखभाल की अतिरिक्त क्षमताएं और काफी अनुभव होना चाहिए और इसके लिए बाल चिकित्सा और बाल चिकित्सा शल्यक विशेषज्ञ सलाहकारों को लगातार 24 घंटे उपलब्ध होना चाहिए। स्तर IV की सुविधाओं में जटिल परिस्थितियों की शल्यक उपचार की क्षमता भी शामिल होगी (उदाहरण के लिए, जन्मजात हृदय संबंधी विकृतियां जिनके लिए शरीर के बाहर स्थित झिल्ली द्वारा ऑक्सीकरण के द्वारा या उसके बिना हृदय तथा फेफड़ों संबंधी बाईपास की आवश्यकता होती है)।

विभिन्न एनआईसीयू में अलग-अलग क्षमताएं होती हैं और इस प्रकार एनआईसीयू का चुनाव मरीज की बीमारी की गंभीरता पर निर्भर करता है। सभी एनआईसीयू में पर्याप्त स्थान, हाथ की स्वच्छता रखने, पर्याप्त देखभाल, बच्चे के अनुकूल अस्पताल की नीतियों को प्रोत्साहित करने, स्तनपान सुनिश्चित करने और सबसे महत्वपूर्ण भावनात्मक प्यार और देखभाल होनी चाहिये।

क्या भारत के पास पर्याप्त संख्या में ऐसी सुविधाएं हैं?

नहीं, आवश्यक बेड की संख्या और उपलब्ध बेड के संख्या में बड़ा अंतर है। विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र में जहाँ बहुत सारे मरीज हैं लेकिन बिस्तरों की संख्या कम है। इसलिए हमें गैर सरकारी संगठनों और कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व गतिविधियों वाली कम्पनीयों के साथ एक निजी- सार्वजनिक भागीदारी की आवश्यकता है जैसे कि हमने अपने शिशु हृदय चिकित्सा (पीडियाट्रिक कार्डियक) और शिशु ट्यूमर का अध्ययन और उपचार विज्ञान (पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजी) कार्यक्रम के लिए किया है।

हर दिन के साथ चीजें बेहतर हो रही हैं और नवजात शिशुओं की मृत्यु को कम करने के बारे में जागरूकता बढ़ रही है। बाल मृत्यु दर को कम करना सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों (एमडीजी) में से एक है और इसके लिए नवजात शिशु मृत्यु एक प्रमुख योगदानकर्ता है। इसे स्वीकार करते हुए सरकार ने भारत नवजात शिशु कार्य योजना और राष्ट्रीय बाल सुरक्षा कार्यक्रम जैसे कई कार्यक्रम शुरू किए हैं। सरकार ने देश भर में कई विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाइयां (एसएनसीयू) स्थापित की हैं।

क्या भारत में गहन चिकित्सा देखभाल सुविधा के तमाम केन्द्रों के लिए पर्याप्त नैदानिक कर्मचारी, चिकित्सक और पराचिकित्सा कर्मचारी हैं?

यहाँ प्रशिक्षित नर्सिंग कर्मचारी की कमी है। भारतीय बाल रोग अकादमी (आइएपी) और राष्ट्रीय नियोनेटोलॉजी फोरम  (एनएनएफ) ने यह सुनिश्चित करने के लिए बहुत अच्छा काम किया है कि हमारे पास पर्याप्त संख्याँ में प्रशिक्षित  चिकित्सक मौजूद हों और चिकित्सकों, नर्सों और अन्य स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों को लगातार प्रशिक्षण देने के साथ-साथ गुणवत्ता का स्तर दिया जाए।

कई सारे गैर-सरकारी संगठन हैं और धर्मार्थ ट्रस्ट हैं जो नवजात शिशु स्वास्थ्य सेवा के लिए धन मुहैया कराते हैं। कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के हिस्से के रूप में कॉर्पोरेट क्षेत्र भी मदद कर रहा है। दुनिया की लगभग 1/6 वीं आबादी वाले हमारे देश के लिए हमें एकल-नवजात मृत्यु दर के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए निरंतर प्रयास की आवश्यकता है।  नवजात स्वास्थ्य के बारे में बेहतर जागरूकता की आवश्यकता है जैसा यह कैंसर या हृदय रोगों के लिए है। अस्पतालों के बाहर अभी भी अस्वच्छ वातावरण में कई बच्चे जन्म ले रहे हैं। कई लोगों के लिए गुणवत्तापूर्ण नवजात शिशु देखभाल अभी भी पहुंच के बाहर है।

भारत में अपूर्णकालिक नवजात शिशुओं में सबसे ज्यादा आने वाले स्वास्थ्य संबंधित मुद्दे क्या हैं जिन्हें संभालने के लिए नवजात शिशु के लिए गहन चिकित्सा देखभाल सुविधा केन्द्रों को सुसज्जित करने की आवश्यकता है?

नवजात शिशु सबसे कमजोर समूहों में से एक हैं भले ही वे स्वस्थ और समय पर पैदा हुए हों। अपूर्णकालिकता  उन्हें प्रतिकूल स्वास्थ्य परिणामों के लिए और भी अधिक संवेदनशील बनाती है। यह दुनिया भर में 5 साल से कम उम्र के बच्चों में मृत्यु का प्रमुख कारण है। दुनिया भर में 15 मिलियन बच्चे समय से पहले पैदा होते हैं जिनमें से 1/5 वें भारत में पैदा होते हैं। हाल के वर्षों में अधिकांश देशों के रुझान, जिनके पास विश्वसनीय डेटा संग्रह है, यह दर्शाता है कि अपूर्णकालिक जन्म की दर बढ़ रही है। पहले से पैदा हुए 15 मिलियन शिशुओं में से 1 मिलियन जीवित नहीं रह पाते हैं। जो जीवित रह जाते हैं उनमें से कईयों में आजीवन विकलांगता, जिसमें श्रवण शक्ति की कमी और देखने की समस्याएं शामिल है, से प्रभावित रह जाते हैं। विकसित दुनिया में 10 में 9 समयपूर्ण होने से बहुत पहले जन्में बच्चे बच जाते हैं; जबकि उप-सहारा अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया सहित कम आय वाले देशों में 10 में से केवल 1 ही बच्चा बच पाता है।

उनके पास अविकसित फेफड़े होते हैं और उन्हें परिपक्व बनाने के लिए दवा की आवश्यकता होती है, बहुत से अपूर्णकालिक बच्चों को कृत्रिम पोषण की आवश्यकता होती है जिसके लिए एक विशेष एनआईसीयू होना चाहिए। उन्हें अपने सीने, हृदय और मस्तिष्क के बार-बार अल्ट्रासाउंड की आवश्यकता होती है इसलिए एनआईसीयू को मशीन से सुसज्जित किया जाना चाहिए और एक प्रशिक्षित व्यक्ति 24 × 7 उपलब्ध होना चाहिए। कुछ उपकरण महंगे हैं, इसलिए सभी एनआईसीयू में लिए सभी उपकरण होना संभव नहीं है और यही कारण है कि ऐसा कोई मानक नहीं है जो यह बताए कि किस एनआईसीयू के प्रत्येक स्तर के लिए कौन से उपकरण की आवश्यकता है। इसके अलावा यह केवल उपकरण कि बात नहीं है, बल्कि सभी चिकित्सकों और कर्मचारियों को उस उपकरण का उपयोग करने और उन्हें संभालने कि महत्ता का ज्ञान होना चाहिये

स्वास्थ्य संबंधी कौन सी स्थितियाँ हैं जिनके लिए किसी भी अपूर्णकालिक शिशु की निगरानी की आवश्यकता होती है?

अपूर्णकालिक शिशुओं पर नजर रखने की जरूरत है कि उनका ऑक्सीजन स्तर हर समय सामान्य सीमा के भीतर है; न तो बहुत कम और न ही बहुत अधिक, क्योंकि दोनों बच्चे को नुकसान पहुंचाते हैं। उनके दिल और मस्तिष्क को जीवन के पहले सप्ताह में कुछ समय देखने की जरूरत है। उनके मस्तिष्क को भी 14वें दिन, 30वे दिन और छोड़े जाने से पहले देखे जाने कि आवश्यकता है। उनके वजन को हर दिन जांचने की जरूरत है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उनका अपनी गर्भावधि उम्र के अनुसार वजन बढ रहा है। सिर और लंबाई की निगरानी साप्ताहिक की जाती है। हमें संक्रमण के किसी भी संकेत को बिना समय गंवाए देखना है और जल्द से जल्द उनके लिए परीक्षण करना है। अपरिपक्व शिशुओं के लिए संक्रमण सबसे बड़ा दुश्मन है। छोड़े जाने से पहले उनकी आंखों और सुनने कि क्षमता को नियमित रूप से जांचने की आवश्यकता है। आवश्यक पड़ने पर प्रारंभिक भागीदारी कार्यक्रम (इंटरवेंशनल प्रोग्राम) शुरू करने के लिए पहले दो वर्षों में तंत्रिका विज्ञान संबधित विकास को नियमित रूप से जांचना की आवश्यकता है।

अस्पताल से छोड़े जाने के बाद अपूर्णकालिक शिशुओं के लिए क्या आवश्यक देखभाल है?

जब तक शिशु घर जाने के लिए पर्याप्त रूप से फिट नहीं होते हैं हम देखभाल करते रहते हैं, उनकी वृद्धि और विकास की जांच करना भी महत्वपूर्ण है। इसमें वजन, लंबाई, सिर का आकार, आंखों की जांच, सुनने आदि की निगरानी शामिल है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि बच्चा सही रास्ते पर है। सुनने की और आँखों की जांच विशेष रूप से बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि सही समय पर नहीं किया गया, तो बाद में पता चलने पर बहुत देर हो सकती है। ये कुछ ऐसी समस्याएं हैं जो दुनिया भर में आम हैं।

हम एक विकासशील देश के रूप में एक और महत्वपूर्ण चुनौती का सामना कर रहे हैं – संक्रमण! अपूर्णकालिक शिशुओं में बहुत कमजोर प्रतिरक्षा होती है और संक्रमित होने का खतरा रहता है। एक बार जब एक बच्चा संक्रमित हो जाता है तो संक्रमण जंगल की आग की तरह पूरे केन्द्र में फैल सकता है। भारत जैसे विकासशील देशों में अपूर्णकालिक शिशुओं की मृत्यु का एक प्रमुख कारण संक्रमण है।

संक्रमण की समस्या से निपटने के लिए क्या किया जा सकता है?

कई सामान्य चीजें हैं जिन्हें अगर सही तरीके से किया जाए तो बहुत आगे बढ़ सकते हैं। तत्परतापूर्वक हाथ धोने जैसी एक साधारण चीज संक्रमण को 50 प्रतिशत तक कम कर सकती है। एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू संक्रमणग्रसित शिशु का अन्य शिशुओं से अलगाव है ताकि यह दूसरों में ना फैल जाए जो कमजोर होते हैं। किसी भी अच्छे एनआईसीयू में खटमल से संक्रमित शिशुओं के लिए एक अलग अलगाव क्षेत्र होना चाहिए। बिस्तरों की पर्याप्त संख्या और मौजूद मरीजों की संख्या को संभालने के लिए पर्याप्त कर्मियों का होना भी महत्वपूर्ण है। अंतर्राष्ट्रीय सिफारिशों में प्रति एनआईसीयू बिस्तर में कम से कम 120 वर्ग फुट जगह होनी चाहिये जिसे संशोधित करके 165 वर्ग फुट कर दिया गया है। भारत सरकार कम से कम 100 वर्ग फीट की सिफारिश करती है। साथ ही दो बिस्तरों के बीच न्यूनतम 4 फीट का अंतर होना चाहिए।

एनआईसीयू, पीआईसीयू और शरीर के बाहर स्थित जीवन समर्थन प्रणाली (ईसीएलएस) के लिए योजना बनाते समय किन नियमों का पालन करना चाहिए? उदाहरण के लिए, भारत सरकार का सुझाव है कि दो बिस्तरों के बीच न्यूनतम 4 फीट का अंतर होना चाहिए?

एनआईसीयू की स्थापना के लिए अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय दिशा-निर्देश हैं जिसमें फ्लोर की योजना, बिजली आपूर्ति, पानी की आपूर्ति, कर्मियों और उपकरणों की उपलब्धता और अन्य चीजें सब कुछ वर्णित है। 2008 से ही अंतरराष्ट्रीय मानक हैं और नवीनतम अपडेट 2017 में आया है जिसमें कहा गया है कि आईसीयू बिस्तर के लिए न्यूनतम बिस्तर स्थान 100 से 160 वर्ग फुट और ईसीएलएस के लिए 200 से 240 वर्ग फुट होना चाहिए। यह फर्श के लिए उपयोग की जाने वाली सामग्री के प्रकार के बारे में भी जानकारी प्रदान करता है की कितनी प्राकृतिक रोशनी और ध्वनि की अनुमति दी जानी चाहिए, आपको ऑक्सीजन/वायु/खिंचाव (सक्शन)/इलेक्ट्रिकल पॉइंट आदि के लिए कितने पॉइंट चाहिए।

एसआरसीसी चिल्ड्रन हॉस्पिटल, नारायण हेल्थ की सुविधा इस तरह की अन्य सुविधाओं से कैसे अलग है?

एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल मुंबई में बच्चों के लिए प्रमुख चिकित्सा संस्थान है जो नारायणा हेल्थ द्वारा चलाई जाती है। इस अस्पताल में बेजोड़ बाल चिकित्सा के साथ शिशुओं, बच्चों और किशोरों के लिए सस्ती, गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा देखभाल सुनिश्चित करने के लिए विश्व स्तरीय सुविधाओं का अनुभव है। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार हमारे पास पूरी तरह से उपकरणों से लैस और एनआईसीयू IV प्रशिक्षित कर्मचारी है। हम जन्मजात बच्चों में जटिल या अधिग्रहित स्थितियों सहित सभी प्रकार की चिकित्सा या शल्य चिकित्सा की स्थिति की देखरेख कर सकते हैं। हमारे पास स्थानीय स्तर पर सभी बाल चिकित्सा और शल्यक उप-विशेषताएं मौजूद है। हमारे पास सभी बीमार शिशुओं को लाने-पहुँचाने के लिए दो अत्याधुनिक एंबुलेंस उपलब्ध हैं जिनके लिए यह नंबर समर्पित है  (+ 91 22 71222333) और हम अपने सभी परामर्श करने वाले अस्पतालों (रेफरल अस्पताल)/चिकित्सकों/ नर्सों को शैक्षिक पहुँच प्रदान करते हैं।

डॉ अमीष वोरा, गंभीर बाल चिकित्सा देखभाल और आपातकालीन सेवाएं, एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल, मुंबई

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