हैप्लोइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट के फायदे

हैप्लोइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट हेमटोपोइएटिक विकारों जैसे ल्यूकेमिया, सिकल सेल एनीमिया, थैलेसीमिया जैसे रोग को संबोधित करता है। NCBI द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन के अनुसार, यह अनुमान लगाया गया है कि भारत में अकेले थैलेसीमिया के लगभग 12,000 नए मामले प्रतिवर्ष पैदा होते हैं, जिनमें से 30% (3600) में उपयुक्त डोनर उपलब्ध हो सकते हैं। हालांकि, भारतीय स्टेम सेल ट्रांसप्लांट रजिस्ट्री (ISCTR) की रिपोर्टिंग के अनुसार वर्ष 2012 और 2016 के बीच थैलेसीमिया से संबंधित कुल 960 मामलों में वास्तविक प्रक्रियात्मक कार्यवाई की गई। अन्य दो बड़े भारतीय केंद्रों के आंकड़ों से पता चलता है कि अप्लास्टिक एनीमिया में केवल 20-30% रोगी हीं देखभाल के मानक सुविधा प्राप्त करते हैं। जाहिर है इस विशाल अंतर को निपटाने की जरूरत है। यह लेख आपको इस अंतराल को कम करने में एक छोटी लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हैप्लोइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट के फायदों को जानने में मदद करेगा।

हैप्लोइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट (BMT) स्टेम सेल ट्रांसप्लांटेशन की एक विधि है, जिसमें पूरे मिलान वाले HLB डोनर की जगह आधे मिलान वाले HLA माता-पिता या सिबलिंग से एकत्र किया जाता है।

हैप्लोइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट क्यों बेहतर है?

  1. डोनर उपलब्धता – डोनर रोगी का रिश्तेदार है और वे वहांमौजूद हैं। थैलेसीमिया, सिकल सेल एनीमिया, ल्यूकेमिया आदि अन्य डिसऑर्डर के अधिकांश मामलों में रोगी गंभीर अभिव्यक्तियों के साथ पीड़ित होते हैं और आमतौर पर उनके पास ज्यादा समय नहीं होता है। यह हैप्लोइडेंटिकल बीएमटी मामलों में छोड़ा जा सकता है। संबंधित डोनर से असंबंधित डोनर रिवॉर्ड बाद में सेलुलर थेरेपी में दीखता है, जैसे कि डोनर लिम्फोसाइट इन्फ्यूशन पोस्ट ट्रांसप्लांटेशन रिलेप्स का प्रबंधन करने के लिए यदि ऐसा होता है।
  2. वेटिंग समय को कम करता है क्योंकि अधिकांश लोगों के पास कम से कम एक हाप्लोइंडिकल रिश्तेदार होता हीं है, जिनमें से माता-पिता और भाई-बहन दोनों शामिल हैं। एक रिश्तेदार के लिए एक अजनबी के मुकाबले एक डोनर के रूप में सामने आना आसान होता है। हालांकि एक समान ट्विन होने की संभावना अत्यंत दुर्लभ है।
  3. प्रगतिशील रूप से जटिलताओं को कम करना – इस क्षेत्र में व्यापक अनुसंधान और बड़ी संख्या में क्लीनिकल परीक्षणों के होने के साथ, ग्राफ्ट-बनाम-होस्ट रोग (जीवीएचडी) या ग्राफ्ट अस्वीकृति जैसी जटिलता को काफी हद तक प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जाता है। एक कमी के रूप में एंटीडोनर एचएलए एंटीबॉडी की उपस्थिति है जो उचित डेसेनिटिज़शन प्रक्रिया द्वारा इन दिनों नियंत्रित किया जाता है।
  4. हैप्लोइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट अन्य उपलब्ध विकल्पों की तुलना में बहुत कम खर्चीला विकल्प है। यह अलग-अलग डोनर रजिस्ट्रियों को बनाए रखने, खोजों को पूरा करने और ट्रांसप्लांट केंद्र तक एक डोनर को लाने के लिए लॉजिस्टिक व्यवस्था प्रदान करने से लेकर ग्राफ्ट प्रक्रिया तक के खर्च को कम कर देता है।
  5. कम से कम 50 प्रतिशत मैच का आश्वासन मिलजाने पर ग्राफ्ट में फिर बहुत कम समय की आवश्यकता होती है।
  6. संग्रह और इन्फ्यूजन के बीच का कम समय लगन के कारण स्टेम सेल्स को कोल्ड इस्किमिया की आवश्यकता नहीं होती है, जिसके वजह से वे ताजा व अच्छे आकार में होते हैं जिसके परिणामस्वरूप ग्राफ्ट से अच्छा परिणाम मिलता है।
  7. ज्यादातर मामलों में इसकी आवश्यकता नहीं हो सकती है, लेकिन यदिआवश्यकता हो तो आसानी से उपलब्ध रिपीट डोनेशन ।
  8. रिलैप्स होने की कम संभावना – NCBI द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, हैप्लोइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट के विभिन्न तरीकों की तुलना करने पर, हैप्लोइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट के मामलों में रिलैप्स की संभावना न्यूनतम दर्ज की गई।

हैप्लोइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट के अन्य रूपों की तुलना में सूची में बड़ी संख्या में फायदे और बिल्कुल कोई नुकसान नहीं मिला है।

डॉ. सुपर्णो चक्रबर्ती, सीन्यर कन्सल्टन्ट और एचओडी – बोन मैरो ट्रांसप्लांट, हैमेटो ऑन्कोलॉजी, ऑन्कोलॉजी, धर्मशीला नारायणा सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल, दिल्ली

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