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स्पाइनल कॉर्ड कंप्रेशन के बारे में आपको ये बातें जननी चाहिए

स्पाइनल कॉर्ड कंप्रेशन के बारे में जानने की आपकी उत्सुकता सही है लेकिन उस से पहले हमें अपने स्पाइनल कॉर्ड को जानना होगा। मानव के रीढ़ की हड्डी सेंट्रल नर्व को नियंत्रित करने वाला हिस्सा है जो मोटी कशेरुक (वेर्टेब्रे) के नीचे होता है। यह निश्चित रूप से सुरक्षा के दृष्टिकोण से होता है क्योंकि स्पाइनल कॉर्ड में चोट के कारण पक्षाघात (परैलिसिस) हो सकता है। डिस्क स्तर से स्पाइनल कॉर्ड नर्व रूट्स (nerve roots) से जुड़ा होता है जो पूरे शरीर में संवेदना और मोटर गतिविधि को संचारित करता है।

कुल 24 कशेरुक (वेर्टेब्रे) हैं जो जिस क्षेत्र को आधार देते हैं उसी हिसाब से बटे हुए हैं जैसे  सर्वाइकल (cervical), थोरैसिक (thoracic), लम्बर (lumbar), सैक्रम (sacrum) और कोक्सीक्स (coccyx) को आधार देते हैं। अब किसी भी दो कशेरुकाओं (वेर्टेब्रे) के बीच एक छोटा मुलायम डिस्क होता है। डिस्क स्तर से स्पाइनल कॉर्ड  नर्व  रूट्स (nerve roots) से जुड़ा होता है जो पूरे शरीर में संवेदना और मोटर गतिविधि को संचारित करता है।

अब जब हम स्पाइनल कॉर्ड के शारीरिक संरचना को जान लिए हैं तो अब आगे स्पाइनल कॉर्ड कंप्रेशन को समझने के लिए आगे बढ़ते हैं। इस तरह के बंद स्थान में होने के वजह से स्पाइनल कॉर्ड में निम्न बातों का खतरा होता है –

  • आघात के कारण चोट लगन
  • डिजेनरेटिव बोन डिज़ीज़ जैसे स्पोंडिलोलिस स्पाइनल कॉर्ड  या तंत्रिका जड़ (nerve root) के सिकुड़ने का कारण बनते हैं
  • डिजेनरेटिव डिस्क पथोलॉजीज़
  • स्कोलियोसिस की तरह असामान्य स्पाइन एलाइनमेंट
  • बढ़ता उम्र
  • ट्यूमर
  • मैनिंजाइटिस जैसा संक्रमण
  • रूमेटाइड आर्थराइटिस

जैसा कि ऊपर बताया गया है कि रोग के लक्षण उस जगह के आधार पर होगा जहाँ से वे पैदा हो रहे हैं –

  • झुनझुनी
  • सुन्न होना
  • दुर्बलता
  • पतला / एट्रोफी
  • यहां तक ​​कि पक्षाघात भी
  • पीठ में अकड़न
  • जलन के साथ दर्द
  • ऐंठन
  • संवेदन का नुकसान
  • समन्वय बनाने की छमता का ह्राष
  • यौन क्षमता में कमी
  • फुट ड्रॉप (लंगड़ाना)

ये तमाम लक्षण कारणों के आधार पर तुरंत या धीरे-धीरे प्रकट हो सकते हैं। कभी-कभी स्पाइनल कॉर्ड का अंत संकुचित हो जाता ता है, जिसके कारण CAUDA EQUINA सिंड्रोम होता है जो की एक मेडिकल इमरजेंसी होता है:

  • आंत्र (bowel) और मूत्राशय (Bladder) पर नियंत्रण खोना
  • एक या दोनों पैरों में दर्द या अत्यधिक कमजोरी जिससे उठाना भी मुश्किल हो जाए
  • जांघ और पैर के अंदरूनी हिस्से में सुन्नपन

पहचान करना:

  • पूछ ताछ – लक्षणों को पता करने के लिए
  • शारीरिक परीक्षा
  1. सेंसेशन का नुकसान
  2. कमजोरी
  3. असामान्यता के स्तर को पता करने के लिए रिफ्लेक्स परीक्षण
  • एक्स-रे- एलाइनमेंट डिसऑर्डर्स या हड्डी के विकास या ओस्टियोफाइट्स का पता करने के लिए
  • सीटी / एमआरआई पहचान की पुष्टि के लिए
  • बोन स्कैन
  • स्पाइनल कॉलम में डाई इंजेक्ट करने के बाद माइलोग्राम
  • मांसपेशियों की गतिविधि का परीक्षण करने के लिए इलेक्ट्रोमोग्राफ
  • नर्व की संवेदना के परीक्षण के लिए नर्व कंडक्शन वेलोसिटी

उपचार:

डॉक्टरों की एक टीम रीढ़ की स्पाइनल कॉर्ड कंप्रेशन को देखते हैं –

  • न्यूरोलॉजिस्ट और न्यूरोसर्जन
  • ओर्थोपैडिशन
  • फ़िज़ियोथेरेपिस्ट
  • ह्रुमेटोलॉजिस्ट

उपचार आमतौर पर स्पाइनल कॉर्ड कंप्रेशन के कारण, स्तर और सीमा पर निर्भर करता है।

  • मेडिकल मैनेजमेंट: NSAIDs, स्टेरॉयड इंजेक्शन दर्द से राहत और नर्व सेल्स के सुरक्षा के लिए जब तक की उपचार शुरू नहीं हो जाता
  • ट्यूमर को रोकने के लिए रेडियोथेरेपी
  • फिजिकल थेरेपी पीठ, पैर या हाथ की मांसपेशियों को मजबूत करने के लिए
  • एर्गोनोमिक और पोस्टुरल सलाह
  • ब्रेसिज़ और कॉलर सपोर्ट के लिए
  • एक्यूपंक्चर और कायरोप्रैक्टिक उपचार
  • सर्जिकल उपचार: स्पाइनल कॉर्ड कंप्रेशन के उपचार के लिए आवश्यकतानुसार कई सर्जरी करने की जरुरत पड़ता है। आइए आगे देखें –
  1. फ्यूज़न: डीजनरेटेड कशेरुका (वेर्टेब्रे ) बोन ग्राफ्ट के द्वारा एक साथ जोड़ दिए जाते हैं। यह सर्जरी का एक प्राचीन रूप है जो रोग को बढ़ने से रोकता है लेकिन स्पाइनल मूवमेंट को कम कर देता है। इसलिए इस सर्जरी का अधिक प्रयोग नहीं किया जाता है।
  2. डिस्क रिप्लेसमेंट: एक या कई डीजनरेटेड डिस्क को हटा दिया जाता है और कृत्रिम डिस्क से बदल दिया जाता है जो नेचुरल डिस्क के समान हीं काम करता है।
डिस्क रिप्लेसमेंट VS. फ्यूज़न डिस्क रिप्लेसमेंट फ्यूज़न
रिकवरी में लगने वाला समय 1 सप्ताह या उससे कम 4-6 सप्ताह
गति की सीमा नेचुरल  स्पाइन के बराबर गति (मोशन) नहीं होता
क्लीनिकल ​​सफलता उच्चा (86.3%)3 कम (70%)3
सर्जरी के बाद दर्द कम दर्द ज्यादा दर्द
फ्यूज़न नो फ्यूज़न हो सकता है
रीएडमिशन ना के बराबर हो सकता है

 

  1. लैमिनोप्लास्टी: इसमें कशेरुकाओं (वेर्टेब्रा) खोल कर स्पाइन पर पड़ने वाले दबाव को हटा कर इसका पुनर्निर्माण किया जाता है।
  2. लंबर स्टेबिलाइजेशन: कशेरुकाओं (वेर्टेब्रा) के बीच एक लचीला और मजबूत टाइटेनियम उपकरण डाला जाता है जो दर्द से राहत और सपोर्ट देने के साथ मूवमेंट को बहाल करता है।
  3. माइक्रोसर्जरी: कशेरुका (वेर्टेब्रा), लिगामेंट या डिस्क का ख़राब अंश का छोटा सा हिस्सा इस माइक्रो इनवेसिव तकनीक के द्वारा हटा कर दबाव से राहत और मूवमेंट को बहाल किया जाता है। इस सर्जरी में 1 इंच या उससे भी कम चीरा लगाते हैं।

इस क्षेत्र में हर दिन नए प्रक्रियाओं की खोज की जा रही है जो कम से कम हानिकारक हों तथा अधिक से अधिक लाभदायक हों।

डॉ. राजेश वर्मा, डायरेक्टर और सीनियर कंसलटेंट – ओर्थोपेडिक्स, स्पाइन सर्जरी | धर्मशीला नारायण सुपरस्पेशलिटी अस्पताल, दिल्ली और नारायणा सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल, गुरुग्राम

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