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ब्रेन स्ट्रोक उपचार में नयी क्रांति: मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी

मस्तिष्क की ब्लॉक्ड रक्त वाहिकाओं को खोलने में 80 से 90 प्रतिशत कारगर:

बदलती लाइफ स्टाइल, तनाव और भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी के कारण युवाओं में भी ब्रेन स्ट्रोक के मामलों में तेजी से बढ़ोत्तरी हो रही है। आंकड़ों के अनुसार ब्रेन स्ट्रोक के कारण अस्पताल में भर्ती होने वाले हर पांच में से एक मरीज की उम्र 40 वर्ष से कम है। डायबिटिज, धूम्रपान, हाइपरटेंशन (उच्च रक्तचाप) एवं अनियमित लिपिड लेवल के कारण लोग कम उम्र मेें ही ब्रेन स्ट्रोक से पीड़ित होने लगे हैं।

स्ट्रोक होने पर फिजिशियन बंद हुई रक्त वाहिकाओं को खोलने के लिए, क्लॉट (खून का थक्का) खत्म करने वाली दवाईयाँ देते है। हालांकि नवीनतम चिकित्सा तकनीक एवं डॉक्टर्स के स्किल सेट में वृद्धी के साथ, ब्रेन स्ट्रोक के इलाज के लिए अब नये विकल्प भी उपलब्ध है। पांच ग्लोबल क्लिनिकल ट्रॉयल्स में देखा गया है कि मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी (स्टेंट के माध्यम से ब्रेन में हुए बल्ड क्लॉट को हटाना) का क्लॉट खत्म करने वाली दवाओं के साथ उपयोग करने पर स्ट्रोक मरीजों में विकलांगता में कमी आयी है एवं न्यूरोलॉजिकल परिणामों में सुधार आया है।

हृदय के लिए एंजियोप्लास्टी की तरह ही मस्तिष्क के लिए मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी कारगार है:

पूर्व में हार्ट अटैक के मरीजों की बंद (ब्लॉक्ड) रक्त वाहिकाओं को खोलने के लिए सिर्फ़ खून को पतला करने वाली दवायें (थ्रोम्बोलिसिस) दी जाती थीं। लेकिन अब दवाओं के साथ प्राईमरी एंजियोप्लास्टी की जाती है ताकि बंद नसों को जल्द से जल्द खोलकर रक्त प्रवाह को सुचारू किया जा सके। ठीक इसी तरह, थक्कारोधी दवाओं के साथ मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी (स्टेंट के माध्यम से बल्ड क्लॉट हटाना) द्वारा उपचार मस्तिष्क की बंद नसों को जल्द से जल्द खोलने व रक्त प्रवाह शुरू करने में मदद करता है। मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी तकनीक से बंद रक्त वाहिकाओं की खुलने की संभावना 80 से 90 प्रतिशत तक हो जाती है जबकि यदि केवल खून पतला करने वाली दवाओं का इस्तेमाल किया जायें तो यह संभावना 30% ही रहती है।

किन मरीजों को मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी का विकल्प चुनना चाहिए?
–  थक्करोधी दवाऐं स्ट्रोक आने के 3 से 4.5 घंटे (गोल्डन पीरियड) तक ही कारगर होती है। यदि मरीज गोल्डन पीरियड के भीतर अस्पताल नहीं      पहुंचता है तो उसे तुरंत इस उपचार तकनीक का चुनाव करना चाहिए।
–  खून पतला करने वाली दवाओं देने के बाद भी यदि मरीज रिकवर नहीं हो रहा है तो उसे कैथ लैब में मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी के लिए जाना           चाहिए।
– जो रोगी एंटी-कॉगुलेंट्स का सेवन कर रहे हैं, जिनकी प्लेटलेट्स की गिनती कम है, या हाल ही में दिल का दौरा, स्ट्रोक, पेप्टिक अल्सर या           सर्जरी हुई है, उन्हें दवाऐं नहीं दी जा सकती। ऐसे मरीजों को सीधा मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी का विकल्प चुनना चाहिए।

स्ट्रोक के उपचार में एक गेम चेंजिंग विकल्प:

मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी तकनीक राजस्थान के चुनिंदा केंद्रों में ही उपलब्ध है। यह न सिर्फ़ जीवन बचाता है बल्कि, स्ट्रोक के बाद विकलांगता की संभावना को भी कम करता है। इस प्रक्रिया में एक रिट्रीवर स्टेंट डिवाइस पेट एवं जांघ की बीच की जगह से रक्तवाहिनी में डाला जाता है और आर्टरी से होते हुए दिमाग तक पहुँचाया जाता है, जहाँ इसका उपयोग खून के थक्के को हटाने के लिए किया जाता है। परीक्षणों से पता चला है कि यदि मरीज स्ट्रोक के लक्षण शुरू होने के 6 से 8 घंटे के भीतर इस प्रक्रिया को कराता है तो उसके जीवित रहने की संभावना और जीवन की गुणवता काफी बढ़ जाती है।

डॉ. प्रशांत सिंह, कंसलटेंट-इंटवेंशनल न्यूरोलॉजी, नारायणा मल्टीस्पेशियलिटी हॉस्पिटल, जयपुर

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