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क्या कैंसर का इलाज कैंसर से भी बदतर है?

कैंसर को बहुत से लोगों ने बहुत भयावह बना दिया गया है, खासकर फिल्मशो के दौरान सरकार द्वारा अनिवार्य रूप से दिखाए जाने वाले विज्ञापनों का इसमें अहम रोल है। इसका मतलब ये नहीं है कि ये एक खतरनाक बीमारी नहीं है, लेकिन उस समय से, जब उन विज्ञापनो का निर्माण नहीं हुआ है, तब से आज तक उपचार के तकनीक में बहुत विकास हो चूका है। इस दृष्टि से वे विज्ञापन सही तस्वीर नहीं दिखाते। कैंसर के इलाज से संबंधित नए तकनीकों ने न केवल इलाज की सफलता दर को बढ़ाया है बल्कि चिकित्सा सत्रों के दौरान और बाद में व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ है।

क्या बदल गया?

अगर मैं गलत नहीं हूँ तो आप अभी भी यही सोचते होंगे कि के होंगे कि कैंसर के उपचार के तीन हीं तरीकें है। जैसे –

  1. कीमोथेरेपी
  2. रेडियोथेरेपी
  3. सर्जरी

ऐसा बहुत कुछ है जो तब से किया जा रहा है और आज एक हद तक अकल्पनीय है।

केमो आईडी – यह थेरेपी इस तथ्य पर आधारित है कि हर रोगी अलग है इसलिए उनका कैंसर भी। उनके ट्यूमर के टिश्यू का एक छोटा सा नमूना परीक्षण के लिए लिया जाता है और इनके विकास परीक्षण किया जाता है आगे इन्हीं को स्टेम सेल के लिए भी उपयोग करते हैं। इसके बाद केमो ड्रग्स बढियाँ रिजल्ट सुनिश्चित करने के लिए इसका टिश्यू पर परीक्षण करते हैं। फिर यही दवा रोगी को दिया जाता है। थेरेपी का सबसे अच्छा बात है –

  • हिट और ट्रेल्स से रोगी को बचाते हैं
  • हिट और ट्रेल्स में बड़ी मात्रा में दवाओं पर पैसा बचाता है
  • हिट और ट्रेल को नियंत्रित करने में शामिल पीड़ित बच जाते हैं
  • विशिष्ट वांछित परिणाम (Specific Desired Results)
  • मरीज और डॉक्टरों दोनों का समय बचता है

रेडिएशन थेरेपी में परिवर्तन – पहले यह माना जाता था कि रेडिएशन थेरेपी कैंसर टिश्यू के साथ साथ नार्मल टिश्यू को भी प्रभावित करती है। तकनीकी प्रगति ने इस परिदृश्य को बदल दिया है जिसे ‘पिन पॉइंट प्रीसिश़न’ कहते हैं। यह तकनीक यह सुनिश्चित करती है कि क्षति केवल कैंसर वाले हिस्से तक ही सीमित रहे। मरीज को स्थिर सांचे में रखा जाता है, जबकि लीनियर ऐक्सेलरैटर जैसे उपकरण से रोगियों के कैंसर वाले टिश्यू पर एक्स-रे के माध्यम से पॉइंटेड रेडिएशन देते हैं।

  1. IMRT या इंटेंसिटी मॉड्यूलेटेड रेडिएशन थेरेपी नामक एक अन्य तकनीक भी उपलब्ध है, जहाँ कंप्यूटर नियंत्रित लीनियर ऐक्सेलरैट सटीक और उपयुक्तरेडिएशन रोगी के ट्यूमर पर डालते हैं। यह तकनीक न केवल कैंसरग्रस्त टिश्यू को लक्षित करती है बल्कि यह भी सुनिश्चित करती है कि आसपास के ऊतक अप्रभावित रहें। इसका उपयोग प्रोस्टेट, सिर और गर्दन और सिर और मस्तिष्क से संबंधित कैंसर के इलाज के लिए किया जाता है।
  2. एक और तकनीक इमेज गाइडेड रेडिएशन थेरेपी या IMGT है। अंतर्निहित समस्या यह होता है कि ट्यूमर सेल्स मलिग्नैंट हो सकती हैं जो मूव कर सकती हैं और रूपांतरित हो सकती हैं। IMGT शरीर में कैंसर के आकार को पहचानता है और अगर वह मूव भी कर रहा है तो ये उसे पहचान लेता है। फिर ये उन पर अत्यंत स्टाकिता के साथ वार करता है जिससे पास के नॉर्मल टिश्यू को कोई छति ना पहुँचे। फेफड़ों, लिवर, प्रोस्टेट ग्रंथि आदि से संबंधित ट्यूमर में इसका सफलतापूर्वक उपयोग किया जा रहा है।
  3. थ्री-डायमेंशनल कंफर्मेशन रेडिएशन थैरेपी में एक मशीन का इस्तेमाल किया जाता है जिसे वाइड-बोअर सीटी सिम्युलेटर कहा जाता है, जो कि ऑनकोरीडोलॉजी के लिए भी उपलब्ध है। यह डॉक्टरों को ट्यूमर और पास के टिश्यू का थ्री-डायमेंशनल मैप बनाने में मदद करता है।
  4. एक अन्य तकनीक जिसे हाई-डोज़ रेट कहा जाता है ब्रेकीथेरेपी कैंसर सेल्स को रेडिएशन देने के लिए एक कैथेटर का उपयोग करती है, जिससे ट्यूमर को सीधे रेडिएशन दिया जा सके।
  5. प्रिसिजन मेडिसिन – प्रिसिजन मेडिसिन किसी व्यक्ति के पर्यावरण, जीवनशैली और जेनेटिक मेकअप के आधार पर रोग का उपचार और रोक थाम का उपाय प्रदान करती है।
  6. जीनोम सिक्वेंसिंग डीएनए म्यूटेशन को उजागर कर सकता है जो एक व्यक्ति के लिए असुरक्षित है। इस जानकारी का उपयोग कैंसर से होने वाले नुकसान को रोकने या कम करने के लिए एक रोकथाम प्रोटोकॉल या विशिष्ट उपचार योजना को डिजाइन करने के लिए किया जाता है।

अब न केवल उपचार के हिस्से को नया रूप दिया गया है बल्कि कैंसर प्रबंधन के सभी पहलुओं में नए प्रतिमान जोड़े गए हैं। पीईटी पर आधारित पहचान की  ​​प्रक्रियाएं जो एक हीं इमेज में शरीर के सारे कैंसर सेल्स को दिखा सकती हैं। इसमें एक कलम के आकर के उपकरण का उपयोग करते हैं जो सभी कैंसर सेल्स  को  पूरे शरीर में रोशन करती हैं जिससे कैंसर सेल्स और नॉर्मल टिश्यू के बीच अंतर पता चल जाता है। मेरा मानना ​​है अब बदले परिदृश्य में विज्ञापनों के उन भयानक छवियों के जगह लिखित निर्देश दिखाने चाहिए और कीमोथेरेपी लेते हुए मुस्कुराते हुए चेहरे दिखाए जाने चाहिए।

डॉ. रणदीप सिंह, डायरेक्टर और सीनियर कंसलटेंट – मेडिकल ऑन्कोलॉजी, ऑन्कोलॉजी, नारायणा सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल, गुरुग्राम

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