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कोविड 19 के मधुमेह पर प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष प्रभाव

बीते वर्ष सार्स सीओवी-2 संक्रमण के बारे में पता लगने के बाद से हमने बीमारी को समझने में और पैथोफिज़ियोलॉजी में एक लंबा फासला तय किया है। कोविड 19 या कोरोना महामारी ने मेडिकल जगत के लोगों को बीमारी के बारे में एक साथ सिखाया। एक ज़रूरी खोज इसके प्रति ज्यादा जोखिम वालों में इसकी बढ़ती मृत्युदर की रही खासतौर पर मधुमेह के मरीजों में।

एक एन्डोक्राइनोलॉजिस्ट होने के नाते, लॉकडाउन के दौर में मुझे कोविड और नॉन कोविड दोनों तरह के मधुमेह के मरीजों के सम्पर्क में रहने का मौका मिला, और लॉकडाउन के बाद के दौर में भी। यह बेशक देखना दिलचस्प था कि बहुत सी छाती की समस्या या निमोनिया जैसी जटिलताओं के साथ एडमिट किये गए मरीजों में अक्सर प्लाज्मा ग्लूकोज़ लेवल बढ़ा हुआ देखने को मिला। हालाँकि जिनको होम आइसोलेशन की सलाह थी उनमें भी कोविड के दौर से पहले की तुलना में ग्लूकोज़ का स्तर बढ़ा हुआ देखने को मिला था। इसके अलावा संक्रमण से रहित मरीजों में भी मधुमेह की अनियंत्रित स्थिति थी। चाहे कोविड के संक्रमण से ग्रसित हों या न हो इसके अलावा भी मधुमेह के मरीज़ों में ग्लूकोज़ का स्तर बढ़ने के बहुत से कारण हो सकते हैं।

कोविड संक्रमित मरीज़ों में पुअर ग्लाईसेमिक कंट्रोल के क्या कारण हो सकते हैं?

  1. सहगामी दवाइयां :- कुछ महीनों पहले यूके के एक अध्ययन में पाया गया कि एक बहुत पुरानी स्टेरॉयड ड्रग “डेक्सामेथासोन” कोविड में होने वाले निमोनिया में बहुत कारगर है। इस अध्ययन ने बाकी के विश्व को इसके इस्तेमाल के लिए प्रेरित किया। हालाँकि इससे बहुत सी जिंदगियां बचाने में मदद मिली, लेकिन इसके साथ ही ग्लूकोज़ के स्तर बिगड़ने के प्रतिकूल प्रभाव में भी इसका परिणाम निकला। ग्लूकोज़ के बढ़ते स्तर को नियंत्रण में लाने के लिए हमारे बहुत से मधुमेह के मरीजों को बहुत सी खाने वाली दवाइयों के साथ साथ हायर इन्सुलिन के डोज़ देने पड़ते थे। उनमें से कुछ को डाईबेटिक कीटोएसिडोसिस (मधुमेह की एक जोखिम भरी जटिलता) का भी सामना करना पड़ा। इससे हमको दवाइयों के सही इस्तेमाल के प्रति हतोत्साहित नहीं होना चाहिए बल्कि ग्लोकोज़ मोनिटरिंग के प्रति अधिक सचेत होना चाहिए और ऐसे मरीजों में तुरंत उपचार बेहद ज़रूरी है।
  2. इन्फ्लेमेशन : मधुमेह सामान्य रूप से इन्सुलिन या इन्सुलिन के संचालन की कमी नतीजा है। एक हाल ही के अध्ययन ने मधुमेह के कारणों में इन्फ्लेमेशन (शरीर के इम्यून की एंटीजेन्स के प्रति प्रतिक्रिया) की भूमिका के बारे में बताया है। कोविड संक्रमण के दौर में इन्फ्लेमेशन की समस्या बहुत है और हम सभी ने साइकोटिक स्टॉर्म इन कोविड (एक ऐसी स्थिति जिस्मने इन्फ्लेमेट्री साइकोटिन्स बहुत ज्यादा बढ़ जाते हैं) के बारे में पढ़ा है, जिसमें बहुत महंगी ड्रग्स जैसे टोक्लीज़ुमैब (एक ऐसी ड्रग जो साइकोटिन्स को रोकता है) आदि का इस्तेमाल करना पड़ा था। बिना स्टेरॉयड के इस्तेमाल के मरीज़ों में अचानक ग्लूकोज़ के स्तर के बिगड़ने का इन्फ्लेमेशन एक कारण हो सकता है। बल्कि जो लोग मधुमेह से पीड़ित नहीं हैं उन्हें भी कोविड इन्फेक्शन के कारण क्षणिक ग्लूकोज़ का स्तर बढ़ा हुआ देखने को मिल सकता है।
  3. टाइप 1 डायबिटीज की डी-नोवो डेवलपमेंट : टाइप 1 डायबिटीज पैनक्रियाज़ की बीटा कोशिकाओं (इन्सुलिन बनने वाली कोशिकाओं) के ऑटो इम्यून डैमेज पहुंचाती है जिसके लिए मरीजों का इलाज केवल इन्सुलिन से किया जाता है। कोविड 19 संक्रमण के बाद से कुछ केस की रिपोर्ट में नई तरह की टाइप 1 डायबिटीज के बारे में बात करतीं हैं जिनसे यह अंदाज़ा लगाया गया कि बहुत मुमकिन है कि सार्स सीओवी -2 पैन्क्रियाज़ के बीटा सेल्स पर भी आक्रमण करता है। बल्कि हाल ही के अध्ययन जिसमें स्टेम सेल्स के इस्तेमाल के साथ पैन्क्रियाटिक सेल्स विकसित किये गए, उसमें बताया गया कि सार्स सीओवी-2 पैन्क्रियाटिक बीटा सेल्स को संक्रमित कर सकता है, जिसमें एजियोटेंसिन को एंजाइम-2 (एसीई-2) में बदलकर जो कि बीटा सेल्स पर असर छोड़ते हैं और संक्रमित सेल्स टाइप 1 डायबिटीज के मरीजों के सेल्स से मिलते जुलते हैं।

नॉन कोविड मरीजों में मधुमेह नियंत्रण : सुगर बिगड़ने के कारण :-

  1. तार्किक कारण : मुझे लॉकडाउन के वे शुरुवाती दिन अच्छी तरह से याद हैं जब तमाम ओपीडी के साथ साथ दवाओं की आपूर्ति भी बंद हो गई थीं। लोगों में कोविड के बारे में बहुत कम जानकारी थी लेकिन डर ने तनाव को बढ़ाने का काम किया और संचार उस वक़्त इतना मज़बूत नहीं था जितना आज है। मैंने 44 टाइप 1 डायबिटीज सब्जेक्ट्स पर ऑनलाइन सर्वे करवाया। यह देखना बहुत आश्चर्यजनक था कि 25 फ़ीसदी बच्चों को खासकर दूरदराज़ के इलाकों में इन्सुलिन लेने के लिए बेहद कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था और वे बड़े शहरों की ओर यात्रायें नहीं कर सकते थे। ठीक उसी तरह ग्लूकोज़ चेकिंग मशीन और उसके स्ट्रिप्स भी अनुपलब्ध थे। यह एक बेहद गंभीर कमी थी क्योंकि इन्सुलिन टाइप 1 डायबिटीज में जीवनरक्षक के समान है। उसके अलावा तकरीबन 65 फ़ीसदी को लॉकडाउन के दौरान वित्तीय अभावों के चलते कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। सरकार, एनजीओ और अस्पतालों को दूरदराज़ के इलाकों तक में इन्सुलिन पहुँचाने के इन्तजाम करने चाहिए।
  2. तनाव सम्बन्धी : इसी सर्वे में और भी बहुत से आश्चर्य में डालने वाले नतीजे सामने आए। हमारे 37 फ़ीसदी टाइप 1 डायबिटीज मरीज़ो में उचित मात्रा में नींद न लेना, 27 फ़ीसदी में कोविड को लेकर एंग्जायटी और 23 फ़ीसदी में जी मिचलाने की असामान्य समस्याएं या कोविड के मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए एंग्जायटी देखने को मिली। इसके फलस्वरूप, 18 फ़ीसदी ने खाने में बहुत हद तक दिलचस्पी त्याग दी थी जिसके चलते उनके ग्लूकोज़ के स्तर पर जोखिम आया।

आगे की राह :

  1. टीम वर्क, वक़्त की सबसे बड़ी ज़रूरत : जहाँ एक ओर वायरस पर केन्द्रित होना बहुत ज़रूरी है, वहीँ ट्रीटमेंट के कारण कोलेटरल डैमेज या मरीजों को होने वाली क्षति का ध्यान रखना भी उतना ही ज़रूरी है। एन्डोक्राइनोलॉजिस्ट और डायबिटीज एजुकेटर कोविड केयर टीम का अभिन्न हिस्सा होने चाहिए, और ठीक यही चीज़ हम एनएच एमएमआई में कर रहे हैं। अस्पताल में रहने के दौरान और उसके बाद भी दोनों समय सभी मरीज़ जिनमें ग्लूकोज़ लेवल बिगड़ा हुआ देखने को मिल रहा है उनको स्पेशेलिस्ट्स के द्वारा नियमित रूप से देखा जाता है, ताकि बढ़ते ग्लुकोज़ लेवल और उसकी जटिलताओं का सामना किया जा सके।
  2. टेली- कम्युनिकेशंस का बेहतर इस्तेमाल : कुछ महीनों पहले लोग ऑनलाइन शॉपिंग के प्रति अनिच्छुक थे इसलिए टेली- कंसल्टेशन के बारे में इतनी गंभीरता से नहीं सोचा गया। लेकिन अब अधिक से अधिक मंच सुविधाजनक डॉक्टरों- मरीजों संवाद के लिए सामने आ रहे हैं, जिससे न केवल मैनेजमेंट संभव हो रहा है बल्कि मरीजों की एंग्जायटी कम करने में भी मदद मिल रही है।
  3. इन्सुलिन संबंधित गैजेट्स की आपूर्ति सुनिश्चित करना : अथॉरिटीज़ को इन्सुलिन को एक जीवन बचाने वाली दवा के रूप में देखना होगा तभी इसकी उपलब्धता हर जगह सुनिश्चित हो पाएगी। ठीक उसी तरह ग्लूकोमीटर और ग्लूकोज़ स्ट्रिप्स डायबिटीज केयर के अभिन्न अंग हैं, इसलिए इनकी उपलब्धता भी मुफ्त होनी चाहिए।

Dr. Shivendra Verma | Consultant – Endocrinology | MMI Narayana Superspeciality Hospital, Raipur

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