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अब ब्लड ग्रुप मैच न होने पर भी होगा किडनी प्रत्यारोपण

गुर्दा प्रत्यारोपण करने के लिए दानदाता और प्राप्तकर्ता के रक्त के समूह की मैचिंग के साथ ही अन्य कई तरह के टेस्ट लगाए जाते हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है ब्लड ग्रुप का मैच होना। अब तक दोनों के रक्त समूह अलग-अलग ग्रुप के हों तो प्रत्यारोपण नहीं हो पाता था। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की नई खोजों से अब ब्लड ग्रुप मैच न हो तब भी किडनी का प्रत्यारोपण किया जा सकता है।

कैसे काम करती है किडनी:

गुर्दे यानी किडनी हमारे शरीर के मास्टर केमिस्ट और होमियोस्टेटिक अंग होते हैं, जो कि शरीर के मध्य भाग में स्थित होते हैं और पूरे शरीर को नियंत्रित व संचालित करते हैं। अगर कहा जाए कि मानव शरीर में हृदय, यकृत और मस्तिष्क ही मुख्य कार्य करते हैं, तो यह भी सत्य है कि इनके संचालन व नियंत्रण की जिम्मेदारी गुर्दों पर ही होती है। किडनी का आकार बंद मुट्ठी के जितना होता है और वजन तकरीबन 150 ग्राम से 180 ग्राम होता है।

एक दिन में 180 लीटर खून साफ करते हैं:

गुर्दे एक दिन में लगभग 180 लीटर खून की सफाई करते हैं और उसमें से 1.5 से 2 लीटर विषैले पदार्थ, जैसे कि यूरिया, क्रिएटिनाइन व हानिकारक अम्ल को मूत्र के द्वारा शरीर से बाहर निकालते हैं। इसके अलावा हमारे जीवन के लिए अति  आवश्यक इलैक्ट्रोलाइट्स का विनिमय, रक्त के आयतन का विनिमय, रक्तचाप नियंत्रण, हारमोंस का उत्सर्जन, रक्त में पीएच का नियंत्रण व ग्लूकोज का स्तर सामान्य रखने में मदद करते हैं। गुर्दे शरीर से उत्सर्जन योग्य पदार्थों तथा अम्लों और अतिरिक्त द्रवों को बाहर करने के साथ-साथ नियंत्रणकारी तथा हॉरमोन उत्पन्न करने वाली ग्रंथियों का भी काम करते हैं।

कितनी होती हैं डायलिसिस होमोडायलिसिस:

इस प्रक्रिया में आर्टिफिशियल किडनी मशीन द्वारा खून की सफाई की जाती है। इसके लिए सबसे पहले मरीज के हाथ में एक छोटा सा ऑपरेशन करतके आर्टरी और वेंस को आपस में जोड़कर आर्टनरी वेंस फिस्ट्युला बनाया जाता है। यह डायलिसिस सफ्ताह में कम से कम 2 से 3 बार किया जाता है।

कांटिन्यूअस एंबुलेटरी पैराटोनियल डाइलिसिस:

इस प्रक्रिया में एक छोटी सी ट्यूब कैथेटर पेट के पैरीटोनियल झिल्ली में लगाई जाती है और द्रव द्वारा स्वतः हर 6 से 8 घंटे पर डायलिसिस करना पड़ता है। इसमें मरीज को स्वयं यह प्रक्रिया करनी पड़ती है।

ऑटोमेटिड पैराटोनियल डायलिसिस:

यह भी मुख्यतः सी.ए.पी.डी की तरह ही होता है, बस फर्क यह है कि यह पूरी प्रक्रिया मशीन के द्वारा होती है। मरीज अपने घर पर इस छोटी मशीन के द्वारा डायलिसिस कर सकता है। यह प्रक्रिया ज्यादातर रात में सोते समय ही की जाती है।

क्या है इम्यूनोएडसोप्रशन प्रक्रिया:

दरअसल इस प्रक्रिया के तहत मरीज के भर्ती करने के बाद सबसे पहले उसके शरीर में मौजूद सभी एंटीबॉडीज को निकालने के लिए दवाइयाँ दी जाती हैं और इसका भी ध्यान रखा जाता है कि मरीज के शरीर में नई एंटीबॉडीज का जन्म न हो। जैसे ही एंटीबॉडीज का स्तर कम हो जाता है और वह सर्जरी करने के स्तर तक आ जाता है, तो तुरंत दारकर्ता की किडनी से उसे प्रत्यारोपण कर दिया जाता है। आमतौर पर शरीर की प्रतिरोधक प्रणाली के द्वारा इनका निर्माण किया जाता है। तो प्रत्यारोपण करते समय सबसे पहले इन एंडीबॉडीज के स्तर पर कड़ी निगरानी रखी जाती है।

नया आविष्कार से मिलेगा नया जीवन:

इस नए आविष्कार से उन मरीजों को नया जीवन मिल सकता है,जिन्हें रक्त समूह मैच न होने के कारण किडनी प्रत्यारोपण कराने में परेशानी आती थी। चूंकि इसमें प्लाज्मा एक्सचेंज किया जाता है, इसमें संक्रमण होने के आसार भी अधिक होते हैं। किंतु वे मरीज जो कि किडनी की दानकर्ता की तलाश में हैं और रक्त न मैच होने के कारण निराश हैं,उनके लिएयह बहुत ही अच्छा विकल्प है।

डॉ. सुदीप सिंह सचदेव, कंसलटेंट – नेफ्रोलॉजी, किडनी ट्रांसप्लांट – एडल्ट, नारायणा सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल, गुरुग्राम

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